☾✦بِسْمِ اللَّهِशुरू करने से पहले
नमाज़ शुरू करने से पहले इत्मीनान से तैयारी करें।
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आपकी प्रगति इसी डिवाइस पर सेव होती है।
नूर-ए-हिदायतنورِ ہدایہ
रोज़ाना की रकअतों, नमाज़ के मरहलों, ऑडियो के अभ्यास और इमाम की पैरवी का एक आसान रहनुमा, जो बिल्कुल शुरुआती लोगों के लिए लिखा गया है और जिसमें रिवायतों के फ़र्क़ को इज़्ज़त से समझाया गया है।
नमाज़ धीरे-धीरे सीखी जाती है। यह रहनुमा आम मरहले बताता है और यह भी कि मान्यता प्राप्त इस्लामी रिवायतें कहाँ अलग हैं। निजी हुक्म या तफ़्सीली अमल के लिए अपनी रिवायत के किसी भरोसेमंद, योग्य उस्ताद से पूछें।
सीखने का एक नज़रिया चुनें। साझा बुनियादें एक बार पढ़ाई जाती हैं; फ़र्क़ इज़्ज़त के साथ उजागर किए जाते हैं।
ये पाठ नमाज़ के आम मरहले बताते हैं। तफ़्सीली अहकाम और मसलक के फ़र्क़ को प्रकाशन से पहले भरोसेमंद स्रोतों से जाँचा और योग्य उलमा से समीक्षित करवाया जाना चाहिए।
कोई पाठ खोलें, बुनियादी बातें सीखें, फिर उसे पूरा चिह्नित करें।
हर कार्ड पर तस्वीर देखें, पाठ खोलें, और हिंदी या अंग्रेज़ी में व्याख्या सुनें।
☾✦بِسْمِ اللَّهِनमाज़ शुरू करने से पहले इत्मीनान से तैयारी करें।
ऑडियो के लिए इंटरनेट चाहिए। डिवाइस की आवाज़ कैसी लगेगी, यह आपके फ़ोन और ब्राउज़र पर निर्भर है।
आपकी प्रगति इसी डिवाइस पर सेव होती है।
पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ों के नाम सीखें। फ़र्ज़ रकअतों की तादाद नीचे दी गई है; सुन्नत और दूसरी अतिरिक्त नमाज़ें अलग हैं।
पहले फ़र्ज़ रकअतें याद करें। नीचे वह जायज़ा है जो हनफ़ी रिवायत में आम तौर पर सिखाया जाता है; सुन्नत, नफ़्ल और वित्र की रकअतों की श्रेणी और तादाद मसलकों और तालीमी रहनुमाओं के बीच अलग होती है।
| नमाज़ | सुन्नत / नफ़्ल (आम हनफ़ी रहनुमा) | फ़र्ज़ | वित्र |
|---|---|---|---|
| الفجرफ़ज्र | 2 सुन्नत मुअक्कदा | 2 | — |
| الظهرज़ुह्र | पहले 4 सुन्नत मुअक्कदा; बाद में 2 सुन्नत मुअक्कदा; अतिरिक्त नफ़्ल वैकल्पिक | 4 | — |
| العصرअसर | पहले 4 सुन्नत ग़ैर-मुअक्कदा (आम तौर पर सिखाई जाती हैं; वैकल्पिक) | 4 | — |
| المغربमग़रिब | बाद में 2 सुन्नत मुअक्कदा; अतिरिक्त नफ़्ल वैकल्पिक | 3 | — |
| العشاءइशा | पहले 4 सुन्नत ग़ैर-मुअक्कदा (आम तौर पर सिखाई जाती हैं); बाद में 2 सुन्नत मुअक्कदा; अतिरिक्त नफ़्ल वैकल्पिक | 4 | 3 (हनफ़ी फ़िक़्ह में वाजिब) |
नमाज़ का वह हिस्सा जो फ़र्ज़ है। पाँच वक़्त की नमाज़ों की फ़र्ज़ रकअतें: फ़ज्र 2, ज़ुह्र 4, असर 4, मग़रिब 3, इशा 4।
वह सुन्नत जिसे नबी ﷺ ने आम तौर पर पाबंदी से अदा किया; उसकी असल अहमियत है। फ़िक़्ही तफ़्सीलात अपने मसलक के उस्ताद से सीखें।
अतिरिक्त वैकल्पिक नमाज़। तालिका वैकल्पिक नफ़्ल को फ़र्ज़ से अलग रखती है।
हनफ़ी फ़िक़्ह में वित्र को वाजिब कहा जाता है; दूसरे मसलक उसके हुक्म और पढ़ने के तरीक़े में अलग राय रखते हैं।
पाँच वक़्त की नमाज़ों के अलावा जो नमाज़ें हमारी ज़िंदगी में आती हैं, उनका तरीक़ा। तफ़्सील आम तौर पर हनफ़ी तरीक़े के मुताबिक़ दी गई है, और जहाँ दूसरे मसलक में फ़र्क़ है वहाँ लिखा है। कृपया अपने इमाम या उस्ताद से पक्का कर लें।
| नमाज़ | रकअतें | कब | हुक्म |
|---|---|---|---|
| जुमुअ़ा | 2 फ़र्ज़ (ख़ुतबे के बाद) | जुमा, ज़ुह्र के वक़्त | फ़र्ज़ (मर्दों पर, जमाअत के साथ) |
| ईदुल-फ़ित्र / ईदुल-अज़हा | 2, अतिरिक्त तकबीरों के साथ | सूरज निकलने के बाद, ज़वाल से पहले | वाजिब (हनफ़ी); दूसरे मसलकों में सुन्नत मुअक्कदा या फ़र्ज़-ए-किफ़ाया |
| जनाज़ा | 4 तकबीरें, बिना रुकू या सजदे के | इंतिक़ाल के बाद, दफ़न से पहले | फ़र्ज़-ए-किफ़ाया |
| तरावीह | 20 (आम तौर पर) या 8 | रमज़ान में, इशा के बाद | सुन्नत मुअक्कदा |
| वित्र | 3 (हनफ़ी) या 1, 3, 5… | इशा के बाद, सोने से पहले (या रात के आख़िरी हिस्से में) | वाजिब (हनफ़ी); सुन्नत मुअक्कदा (दूसरे मसलक) |
| तहज्जुद | 2 से 12 (जोड़ों में) | सोने के बाद, रात के आख़िरी हिस्से में | नफ़्ल |
| इशराक़ / चाश्त | 2 से 12 (जोड़ों में) | सूरज निकलने के लगभग 15-20 मिनट बाद / दिन चढ़ने पर | नफ़्ल |
कौन पढ़े: यह उन मुसलमान मर्दों पर फ़र्ज़ है जो आक़िल, बालिग़, मुक़ीम और सेहतमंद हों। औरतें, मुसाफ़िर, बीमार और जायज़ उज़्र वाले लोग उसकी जगह ज़ुह्र की 4 रकअत पढ़ें।
तरीक़ा: ग़ुस्ल करें, साफ़ कपड़े पहनें, ख़ुशबू लगाएँ और जल्दी मस्जिद जाएँ। अज़ान के बाद सुन्नत पढ़ें; फिर इमाम दो ख़ुतबे देता है — ख़ुतबा ख़ामोशी से सुनें. फिर पढ़ें 2 रकअत फ़र्ज़ इमाम के पीछे जमाअत के साथ (इमाम आवाज़ से तिलावत करता है)। बाद में सुन्नत पढ़ें।
सुन्नत रकअतों की तादाद: हनफ़ी तालीम में आम तौर पर फ़र्ज़ से पहले 4 और बाद में 4 + 2 रकअत होती हैं; दूसरे मसलक बाद की कम सुन्नतें (2 या 4) सिखाते हैं।
क़ुरआन: जब जुमे के दिन नमाज़ के लिए पुकारा जाए तो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ जल्दी चलो और ख़रीद-फ़रोख़्त छोड़ दो। (सूरह अल-जुमुअ़ा 62:9)
आदाब: जुमे के दिन सूरह अल-कहफ़ पढ़ना और नबी ﷺ पर दरूद भेजना मुस्तहब है।
तैयारी: ग़ुस्ल, अपने सबसे अच्छे कपड़े और ख़ुशबू। ईदुल-फ़ित्र पर नमाज़ से पहले कुछ मीठा (खजूर) खाएँ और अदा करें सदक़ा-ए-फ़ित्र। ईदुल-अज़हा पर नमाज़ के बाद खाएँ। ईद के दिन लौटते वक़्त दूसरा रास्ता लेना सुन्नत है (बुख़ारी)।
नमाज़: 2 रकअत जमाअत के साथ, बिना अज़ान और बिना इक़ामत के. नीयत के बाद: तकबीर-ए-तहरीमा, फिर सना। फिर हनफ़ी: 3 अतिरिक्त तकबीरें (हर बार हाथ कानों तक उठाकर छोड़ दें), फिर फ़ातिहा और सूरह, फिर रुकू। दूसरी रकअत में फ़ातिहा और सूरह के बाद 3 अतिरिक्त तकबीरें, फिर चौथी तकबीर के साथ रुकू करें। दूसरे मसलक: पहली रकअत में 7 और दूसरी में 5 अतिरिक्त तकबीरें।
ख़ुतबा: ईद पर ख़ुतबा होता है के बाद नमाज़ के (जुमुअ़ा के उलट)।
तकबीर-ए-तशरीक़ (ईदुल-अज़हा: 9 से 13 ज़िल-हिज्जा, फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद; दिन गिनने में उलमा में थोड़ा फ़र्क़ है):
اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَاللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ وَلِلَّهِ الْحَمْدُ
ईद की मुबारकबाद: “तक़ब्बलल्लाहु मिन्ना व मिन्कुम” تَقَبَّلَ اللَّهُ مِنَّا وَمِنْكُمْ: सहाबा एक-दूसरे को इसी तरह मुबारकबाद देते थे (“अल्लाह हमसे और आपसे इसे क़ुबूल फ़रमाए”)।
हुक्म: फ़र्ज़-ए-किफ़ाया: अगर कुछ लोगों ने पढ़ ली तो बाक़ी से ज़िम्मेदारी उतर जाती है। यह खड़े होकर पढ़ी जाती है: न रुकू, न सजदा, न अज़ान। इमाम मय्यित के सीने के बराबर खड़ा होता है; मुक़्तदी उसके पीछे सफ़ें बनाते हैं।
तरीक़ा (हनफ़ी):
اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا وَشَاهِدِنَا وَغَائِبِنَا وَصَغِيرِنَا وَكَبِيرِنَا وَذَكَرِنَا وَأُنْثَانَا. اللَّهُمَّ مَنْ أَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَأَحْيِهِ عَلَى الْإِسْلَامِ وَمَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفَّهُ عَلَى الْإِيمَانِ
Allahummaghfir li-hayyina wa mayyitina wa shahidina wa gha’ibina wa saghirina wa kabirina wa dhakarina wa unthana. Allahumma man ahyaytahu minna fa-ahyihi ‘alal Islam, wa man tawaffaytahu minna fa-tawaffahu ‘alal Iman.नाबालिग़ बच्चे की जनाज़ा: तीसरी तकबीर के बाद हनफ़ी किताबों में यह दुआ बताई गई है: اللَّهُمَّ اجْعَلْهُ لَنَا فَرَطًا وَاجْعَلْهُ لَنَا أَجْرًا وَذُخْرًا وَاجْعَلْهُ لَنَا شَافِعًا وَمُشَفَّعًا (लड़की के लिए “اجْعَلْهَا” कहें)।
सवाब: जो जनाज़े की नमाज़ में शामिल हो उसे एक क़ीरात का सवाब मिलता है, और जो दफ़न तक ठहरे उसे दो क़ीरात का; हर क़ीरात एक बड़े पहाड़ के बराबर है (बुख़ारी, मुस्लिम)। ग़ुस्ल, कफ़न और दफ़न के लिए देखें आख़िरत की तैयारी.
रमज़ान में यह इशा के बाद (वित्र से पहले) दो-दो रकअत करके पढ़ी जाती है। हनफ़ी, शाफ़िई, हंबली और मालिकी उलमा की अक्सरियत कहती है 20 रकअत (उमर ؓ के ज़माने से जमाअत का अमल)। कुछ उलमा पढ़ते हैं 8 रकअत، आइशा ؓ की एक रिवायत पर भरोसा करते हुए। दोनों तरीक़े उलमा के यहाँ जाने-पहचाने हैं; अपनी मस्जिद के रिवाज की पैरवी करें।
हदीस: “जिसने ईमान और सवाब की नीयत से रमज़ान में क़ियाम किया, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।” (बुख़ारी, मुस्लिम)
हनफ़ी: 3 रकअत एक सलाम के साथ। पहली दो रकअत के बाद बैठें (सिर्फ़ तशह्हुद)। तीसरी में फ़ातिहा और सूरह के बाद हाथ कानों तक उठाकर “अल्लाहु अकबर” कहें, हाथ बाँधें, दुआ-ए-क़ुनूत पढ़ें, फिर रुकू करें। दूसरे मसलक: 1, 3, 5 या ज़्यादा रकअतें; क़ुनूत की जगह और तरीक़ा भी अलग हो सकता है।
اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْتَعِينُكَ وَنَسْتَغْفِرُكَ وَنُؤْمِنُ بِكَ وَنَتَوَكَّلُ عَلَيْكَ وَنُثْنِي عَلَيْكَ الْخَيْرَ وَنَشْكُرُكَ وَلَا نَكْفُرُكَ وَنَخْلَعُ وَنَتْرُكُ مَنْ يَفْجُرُكَ. اللَّهُمَّ إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَلَكَ نُصَلِّي وَنَسْجُدُ وَإِلَيْكَ نَسْعَى وَنَحْفِدُ وَنَرْجُو رَحْمَتَكَ وَنَخْشَى عَذَابَكَ إِنَّ عَذَابَكَ بِالْكُفَّارِ مُلْحِقٌ
अगर दुआ-ए-क़ुनूत याद न हो, तो हनफ़ी किताबों में “रब्बना आतिना फ़िद-दुनिया हसनतन व फ़िल-आख़िरति हसनतन व क़िना अज़ाबन-नार” पढ़ने या तीन बार “अल्लाहुम्मग़फ़िर ली” कहने का ज़िक्र है। याद होने तक अपने इमाम से पूछ लें।
इशा के बाद थोड़ी देर सो लें, फिर रात के आख़िरी हिस्से में उठकर दो-दो रकअत करके पढ़ें (कम से कम 2, ज़्यादा से ज़्यादा 12; नबी ﷺ आम तौर पर 8 रकअत और वित्र पढ़ते थे, बुख़ारी/मुस्लिम)। फिर लंबी दुआ और इस्तिग़फ़ार करें।
“हमारा रब हर रात, रात के आख़िरी तिहाई हिस्से में दुनिया के आसमान पर उतरता है और फ़रमाता है: कौन है जो मुझसे माँगे कि मैं उसे दूँ?” (बुख़ारी, मुस्लिम)। क़ुरआन में: सूरह अल-इसरा 17:79।
इशराक़: फ़ज्र के बाद उसी जगह बैठे ज़िक्र करते रहें, और सूरज निकलने के बाद (जब मकरूह वक़्त ख़त्म हो जाए) 2 रकअत पढ़ें। एक हदीस में पूरे हज और उमरे के सवाब का वादा है (तिर्मिज़ी 586: अल-तिर्मिज़ी इसे हसन ग़रीब कहते हैं और अल-अल्बानी हसन, लेकिन दारुस्सलाम और ज़ुबैर अली ज़ई रावी अबू ज़िलाल की वजह से इसकी सनद को ज़ईफ़ कहते हैं; उलमा में इख़्तिलाफ़ है, इसलिए इसे विवादित सनद वाली फ़ज़ीलत समझें)।
चाश्त / ज़ुहा: दिन चढ़ने के बाद, ज़वाल से पहले 2 से 12 रकअत। हदीस: हर सुबह इंसान के जिस्म के हर जोड़ पर सदक़ा लाज़िम होता है, और ज़ुहा की दो रकअतें उसके बदले काफ़ी हैं (मुस्लिम)।
अगर किसी जायज़ मामले में फ़ैसला न कर पाएँ तो 2 रकअत नफ़्ल (फ़र्ज़ के अलावा), फिर यह दुआ पढ़ें। जब दुआ में هَذَا الْأَمْرَ अपने काम का नाम लें, या उसे दिल में याद रखें (बुख़ारी):
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْتَخِيرُكَ بِعِلْمِكَ، وَأَسْتَقْدِرُكَ بِقُدْرَتِكَ، وَأَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِكَ الْعَظِيمِ، فَإِنَّكَ تَقْدِرُ وَلَا أَقْدِرُ، وَتَعْلَمُ وَلَا أَعْلَمُ، وَأَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ. اللَّهُمَّ إِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هَذَا الْأَمْرَ خَيْرٌ لِي فِي دِينِي وَمَعَاشِي وَعَاقِبَةِ أَمْرِي فَاقْدُرْهُ لِي وَيَسِّرْهُ لِي ثُمَّ بَارِكْ لِي فِيهِ، وَإِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هَذَا الْأَمْرَ شَرٌّ لِي فِي دِينِي وَمَعَاشِي وَعَاقِبَةِ أَمْرِي فَاصْرِفْهُ عَنِّي وَاصْرِفْنِي عَنْهُ وَاقْدُرْ لِيَ الْخَيْرَ حَيْثُ كَانَ ثُمَّ أَرْضِنِي بِهِ
अहम: इस्तिख़ारा में ख़्वाब देखना ज़रूरी नहीं। रहनुमाई दिल का झुकाव है, और काम का आसान हो जाना या रुकावट आ जाना। किसी समझदार इंसान से मशवरा भी करें।
मुसाफ़िर पढ़ता है ज़ुह्र, असर और इशा की 4 रकअत की जगह 2 रकअत (क़स्र)। फ़ज्र (2), मग़रिब (3) और वित्र (3) जैसे हैं वैसे ही रहते हैं। क़स्र तब लागू होता है जब सफ़र की मुख्य शर्त पूरी हो (लगभग 77–80 किमी का सफ़र) और जब तक आप किसी जगह 15 दिन से कम ठहरने का इरादा रखें (हनफ़ी)। दूसरे मसलकों में दूरी और मुद्दत के बारे में कुछ फ़र्क़ है। जो मुसाफ़िर मुक़ीम इमाम के पीछे पढ़े, वह पूरी 4 रकअत पढ़ता है।
क़स्र का हुक्म सूरह अन-निसा 4:101 में है।
अगर नमाज़ का कोई वाजिब छूट जाए या रकअतों की गिनती में शक हो (हनफ़ी): आख़िरी तशह्हुद के बाद, सिर्फ़ दाईं तरफ़ सलाम फेरें, 2 सजदे करें, फिर दोबारा तशह्हुद, दरूद और दुआ पढ़कर दोनों तरफ़ सलाम फेरें। अगर शक हो तो उस तरफ़ अमल करें जिधर दिल झुके; अगर बिल्कुल फ़ैसला न हो सके तो कम रकअत मान लें, नमाज़ पूरी करें और सजदा-ए-सह्व करें।
ईद की तकबीरों, जनाज़े की पहली तकबीर, वित्र और तरावीह की रकअतों की तादाद में मसलकों के बीच मान्यता प्राप्त और जायज़ इख़्तिलाफ़ है। जिस मसलक या मस्जिद के साथ आप नमाज़ पढ़ते हैं, उसका तरीक़ा सीखें।
अगर अरबी मुश्किल लगे तो पहले सुनें और तजवीद समेत उस्ताद के साथ सीखें। मुश्किल दुआ का पहले एक छोटा हिस्सा याद करना भी ठीक है।
यह सीखने का एक बुनियादी नक़्शा है। अरबी तिलावत को सही तलफ़्फ़ुज़ के साथ किसी उस्ताद या ऑडियो से सीखें; फ़िक़्ही तफ़्सीलात को उस रिवायत के मुताबिक़ जाँचें जिसकी आप पैरवी करते हैं।
नमाज़ का वक़्त शुरू हो गया हो, वुज़ू हो, कपड़े और जगह पाक हों, सतर ढका हो और रुख़ क़िबले की तरफ़ हो।
दिल में तय करें कि कौन-सी नमाज़ पढ़ रहे हैं। नीयत दिल का इरादा है; कोई एक तय बोला जाने वाला जुमला हर किसी पर लाज़िम नहीं।
“अल्लाहु अकबर” कहकर शुरू करें। खड़े होकर अपनी रिवायत के मुताबिक़ सना, अल-फ़ातिहा और आगे की तिलावत पढ़ें।
रुकू में इत्मीनान से झुकें और तस्बीह पढ़ें: सुब्हाना रब्बियल अज़ीम।
سُبْحَانَ رَبِّيَ الْعَظِيمِ
रुकू से उठकर पूरी तरह सीधे खड़े हों। इस हालत में जल्दी न करें।
सजदे में जाएँ, दोनों सजदों के बीच बैठें, फिर दूसरा सजदा करें। हर हरकत में सुकून और इत्मीनान रखें।
سُبْحَانَ رَبِّيَ الْأَعْلَى
दूसरी रकअत के लिए खड़े होकर तिलावत करें, रुकू करें और दो सजदे करें। 3 या 4 रकअत वाली नमाज़ों में आगे की तरतीब अपने मसलक के मुताबिक़ सीखें।
रकअतों की तादाद के मुताबिक़ दरमियानी बैठक (क़अदा) में तशह्हुद, और आख़िरी बैठक में दरूद और दुआ पढ़ी जाती है, फिर सलाम फेरा जाता है। हर फ़र्ज़ या सुन्नत नमाज़ की सही तरतीब अपने मसलक के मुताबिक़ सीखें।
जमाअत में इमाम की पैरवी के बुनियादी आदाब और शुरुआती लोगों की एक चेकलिस्ट।
इमाम के पीछे सीधी सफ़ में खड़े हों। जगह और सफ़ें बनाने के बारे में मस्जिद के इमाम या वालंटियर की रहनुमाई मानें।
दिल में नीयत करें। जमाअत में शामिल होने का तरीक़ा और तकबीर कब कहनी है, यह अपनी मस्जिद के मुताबिक़ सीखें; इमाम से आगे न बढ़ें।
इमाम से पहले रुकू, सजदा या सलाम न करें। जब इमाम हालत बदले तो उसके बाद उसकी पैरवी करें; हरकतों में जल्दबाज़ी न करें।
इमाम के पीछे अल-फ़ातिहा या दूसरी तिलावत पढ़ी जाए या नहीं और कैसे, इसमें मसलकों के बीच फ़र्क़ है। हनफ़ी, शाफ़िई, मालिकी, हंबली, जाफ़री और इबाज़ी तरीक़ों को एक ही नियम न समझें; अपनी रिवायत के किसी भरोसेमंद उस्ताद से सीखें।
अगर जमाअत चल रही हो तो इत्मीनान से शामिल हों और इमाम की मौजूदा हालत के मुताबिक़ अमल करें। कौन-सी रकअत गिनी जाएगी और छूटा हुआ हिस्सा बाद में कैसे पूरा करना है, यह अपने मसलक के मुताबिक़ सीखें।
अपनी छूटी हुई रकअत पूरी करने के लिए इमाम के सलाम के बाद ही खड़े हों, अगर आपकी कोई रकअत बाक़ी है। यक़ीन न हो तो नमाज़ के बाद इमाम से पूछ लें।
फ़र्ज़ लाज़िम है। सुन्नत वह अमल है जो नबी ﷺ से साबित है; उसकी श्रेणियाँ और फ़िक़्ही तफ़्सीलात हर मसलक के मुताबिक़ समझी जाती हैं। दोनों को एक ही चीज़ न समझें।
नीयत की असल जगह दिल है। ज़ुबान से बोले जाने वाले अल्फ़ाज़ के बारे में सिखाने के तरीक़े अलग हैं; इसे सब पर लाज़िम कहने से पहले अपने मसलक की भरोसेमंद रहनुमाई देखें।
अरबी क़दम-ब-क़दम सीखें, ऑडियो को किसी योग्य क़ारी से मिलाएँ और उस्ताद से अपना तलफ़्फ़ुज़ ठीक करवाएँ। रोमन लिखावट मददगार है, लेकिन यह अरबी की आवाज़ों को पूरी तरह ज़ाहिर नहीं कर सकती।
भूल के अहकाम हालत और मसलक के मुताबिक़ अलग होते हैं। अंदाज़े से हुक्म न बनाएँ; अपने इमाम या योग्य उस्ताद को ठीक-ठीक सूरत बताएँ।
इबादत का बुनियादी अमल साझा है, लेकिन कुछ हालतों, तिलावत और फ़िक़्ही तफ़्सीलात में मान्यता प्राप्त फ़र्क़ हैं। यह वेबसाइट इन फ़र्क़ों को इज़्ज़त के साथ और हवालों के साथ समझाती है।
डिवाइस की आवाज़ आपके ब्राउज़र और इंस्टॉल की गई आवाज़ों पर निर्भर है। क़ुरआन की तिलावत का ऑडियो इंटरनेट से आता है; न चले तो अपना कनेक्शन और ब्राउज़र की सेटिंग जाँचें।
यह शुरुआती सीखने वालों के लिए एक इंटरफ़ेस है, मुकम्मल फ़तवों का हवाला नहीं। तफ़्सीलात इस्लामी फ़िक़्ही मसलकों और उलमा के बीच अलग हो सकती हैं। तफ़्सीली अहकाम, अरबी तिलावत, ऑडियो और तुलना के दावे जोड़ने से पहले सामग्री की समीक्षा उन मसलकों के योग्य प्रतिनिधियों से करवाई जाए।